Friday, July 4, 2008

law experince

मुझे 27 जून को चंडीगढ़ में आयोजित ‘लॉ’ वर्कशॉप में भाग लेने का मौका मिला, जिसमें स्टेट हैड श्री उत्तमसेन गुप्त, मेजर दीपक चौधरी, श्री प्रभात सिंह, श्री विजय त्रिपाठी जी के सानिध्य में काफी कुछ सीखने को मिला।
पहले स्टेट हैड श्री उत्तमसेन जी ने हमें लॉ के बेसिक के बारे में बताया, जिसमें उन्होंने किसी खबर में वर्जन के महत्व को स्पष्ट किया। उन्होंने आईपीसी और सीआरपीसी के अंतर को भी बताया। उन्होंने बताया कि आईपीसी यानि इडिंयन पैनल कोड में अपराध की सजा तय होती है, जबकि सीआरपीसी अर्थात क्रिमिनल प्रोसीडयूरल अर्थात कोर्ट में पेशी या तारीख के बारे में तय होता है।
संपादक प्रभात सिंह जी ने लुधियाना के जज प्रकरण की कमियों को उजागर किया कि लुधियाना की महिला को चंडीगढ़ में प्रैस कांफैं्रस करने की क्या आवश्यता थी। खबर में महिला ने एक जज पर बलात्कार के आरोप लगाए थे, जबकि पुलिस में इसकी सूचना नहीं दी गई थी। नतीजन, अखबार को नोटिस मिला।
एचआरडी चीफ मेजर दीपक चौधरी ने खबर में कंटैंट की कमी के कारण भास्कर ग्रुप के खिलाफ हुए कुछ चुनिंदा कोर्ट केसों के बारे में बताय। एक मामले में तो मात्र एक शब्द के कारण केस हुआ था जिसके डैफामेशन में भास्कर को सवा पांच लाख रुपए का भुगतान करना पड़ा।
उसके बाद ग्रुप के कानूनी सलाहाकार और वरिष्ठ एडवोकेट श्री तरसेम मित्तल ने कंटैप्ट ऑफ कोर्ट और डैफामेशन के बारे में विस्तारपूर्वक बताया। उन्होंने बताया कि किन-किन मामलों में हमें कोर्ट की प्रोसिडिंग प्रकाशित करनी चाहिए और किन मामलों में नहीं। अगर कोई प्रोसिडिंग चल रही हो और फैसला हो जाने के बाद अगर लगे कि जज ने फैसला किसी से प्रभावित होकर दिया है तो जज के बारे में लिखा जा सकता है या नहीं? लिखा जाए तो किस तरह से, ताकि मानहानि का केस न हो पाए?
उनके बाद बार एसोसिएशन चंडीगढ़ के प्रधान श्री एन.के. नंदा ने हमारे सवालों के जवाब दिए। उन्होंने बताया कि क्रिमिशनल डैफामेशन में पुलिस केस शामिल नहीं होते। इन मामलों में कोर्ट अपने स्तर पर जांच करती है। जांच सही पाए जाने पर आरोपी को सम्मन जारी होते हैं और फिर एक साल तक कैद। जज के गलत फैसले के खिलफ डैमेज का मामला डाला जा सकता है न कि मानहानि का। इसके अलावा ढीली पुलिस प्रकिया के कारण कोर्ट के अधिकतर फैसले प्रभावित होते हैं।
सैक्शन-10 : पुलिस जब किसी आरोपी को दस नंबर डिक्लेयर करती है तो उसे हर शाम पुलिस थाने में हाजिरी लगवानी पड़ती है।
जब तक आरोपी को सजा नहीं मिलती, वह जेल में रहते हुए भी कोई काम नहीं करता। जब कोर्ट उसे सजा सुना देती है, तब जाकर सजा के आधार पर उसे काम पर लगाया जाता है।

निष्कर्ष

-कोर्ट में विचाराधीन मामलों की खबर प्रकाशित नहीं करनी चाहिए।
-डैफामेशन के केस कोर्ट में एक साल के अंदर-अंदर फाइल होने चाहिए उसके बाद केस फाइल नहीं हो सकता।
-सबूत के तौर पर कोर्ट की कॉपी, वायस रिकार्डिंग हो तो ओरीजिनल होनी चाहिए।
-रिसर्च के मामलों में कभी डैफामेशन के चांस नहीं होते।
-उम्रकैद की सजा मैक्सिमम 20 साल की होती है।
-संसद में जिस बयान को स्पीकर ऑफ द रिकार्ड करवा देते हैं, उसे नहीं छापा जा सकता।
- जज के बारे में ज्यूडिशियली लैवल पर कुछ नहीं लिखा जा सकता, प्रशासनिक स्तर पर उसके खिलाफ कुछ भी छापा जा सकता है। अर्थात उसकी जमीन-जायदाद को लेकर, चंडीगढ़ में खबर प्रकाशित हो चुकी है।


क्विज

सब ज्यूडिस से आपका क्या अभिप्राय है?
---जो मामला कोर्ट में विचाराधीन है, अर्थात अंडर ट्रायल मामला
धार्मिक भावनाएं भड़काने का मामला कौन से कानून के तहत किस सैक्शन में आता है
---आईपीसी की धारा 295 से लेकर 298 तक में संबधिंत मामले आते हैं...298 धार्मिक भावनाएं भड़काने का है।
मानहानि के मामले में किस-किस तरह की सजा का प्रावधान है?
---पहले दो साल की सादे कारावास की सजा का प्रावधान था, अब घटकर एक साल रह गया। इसमें जुर्माना व दोनों साथ का भी प्रावधान है।
मर्डर और कल्पेलबल हॉमिसाइड में क्या अंतर है?
---मर्डर मतलब हत्या-सोच-समझकर किसी पर हमला करना, जिसमें उसकी मौत हो जाए...धारा 300
---कल्पेलबल हार्मिसाइड : जब कोई व्यक्ति किसी को चोट पहुंचाता है, जिसकेे लिए वह जानता है कि उसकी मौत हो सकती है तो वह कल्पेलबल हॉमिसाइड का दोषी है। इसे गैर इरादतर हत्या नहीं कहा जा सकता। इसमें धारा 299 लगती है। उदाहरणतया-एक व्यक्ति दूसरे को मारने के लिए गोली चलाता है और गोली तीसरे को लगती है तो पहला व्यक्ति कल्पेलबल हॉमिसाइड का दोषी माना जाएगा।
मानहानि के लिए सजा का प्रावधान कौन से कानून में किस सैक्शन के तहत दिया गया है?
---आईपीसी की धारा 499 व 500
चोरी कौन से एक्ट में किस धारा के तहत आता है
---थैफ्ट एक्ट के तहत आईपीसी की धारा 378
--लूट : 390 --डकैती : धारा 391 --रिश्वत : धारा 161 --ठगी : धारा 415 व 420
--दहेज उत्पीड़न : 498, बलात्कार : धारा 375 व 376
किसी को चोट पहुंचना
साधारण चोट हो, जैसे दांत तोड़ना तो धारा 319
गंभीर चोट हो तो 320 सैक्शन छह के तहत
किडनैपिंग और एबडक्शन में क्या अंतर है?
---18 साल से कम अथवा नाबालिग को ले जाना किडनैपिंग अथवा व्यपहरण कहलाता है, इसमें बल के प्रयोग का कोई महत्व नहीं है। जबकि किसी भी आयु के व्यक्ति को उठाकर ले जाना एबडक्शन अर्थात अपहरण कहलाता है, इसमें बल या छल का प्रयोग होना स्वाभाविक है।
जुवैनाइल ऑफेंडर से आपका क्या अभिप्राय है?
---14 साल से कम बच्चे जो किसी अपराध में शामिल हों।
मर्डर किस कानून में किस सैक्शन में दिया गया है?
---मर्डर में आईपीसी की धारा 300 लगती है, जबकि जब किसी के खिलाफ पर्चा दर्ज होता है तो उसपर धारा 302 के तहत पर्चा दर्ज होता है।
मानहानि के मामले में कोई दो अपवाद यानि डिफैंस बताएं?
---आरोप सही होने चाहिए, जिसके छपने से लोक कल्याण हो, वह मानहानि नहीं होती।
---कोर्ट की कार्रवाई की रिपोर्ट का प्रकाशन किसी सूरत में मानहानि नहीं होती।
कॉगनिजेबल और नॉन कॉगनिजेबल आफेंस में क्या फर्क है?
---पुलिस अधिकारी अभियुक्त को बिना वारंट के गिरफ्तार कर सकता है, जबकि दूसरे अपराध में बिना वारंट के गिरफ्तारी संभव नहीं है।
पुलिस रिमांड और ज्यूडिशियल रिमांड में क्या फर्क है?
---पुलिस रिमांड में आरोपी से पुलिस पूछताछ करती है।
---ज्यूडिशियल रिमांड में आरोपी जेल में रहता है।
बेलबल और नॉन बेलबल ऑफेंस में क्या फर्क है?
--जिन मामलों में आरोपी को जमानत मिल जाती है उन्हें बेलबल ऑफेंस अर्थात जमानती अपराध कहते हैं।
---जिन संगीन मामलों में आरोपी को जमानत नहीं मिल पाती, उन्हें नॉन बेलेबल ऑफेंस कहते हैं।
सुसाइड को कौन से एक्ट और किस सैक्शन में अपराध माना गया है?
---आईपीसी की धारा 309 के तहत आत्महत्या का प्रयास करना।
अबेटमैंट-टू-सुसाइड किस एक्ट के तहत ऑफेंस?
---धारा 306 मतलब आत्महत्या के लिए मजबूर करना
किस केस की इंवेस्टिगेशन और इंक्वायरी में क्या फर्क है?
---इंवेस्टिगेशन पुलिस करती है, जबकि इंक्वायरी ज्यूडिशियल होता है जो जज मार्क करता है।
कंटेप्ट ऑफ कोर्ट से आपका क्या अभिप्राय है?
---कोर्ट के आदेशों की अवमानना, यह दो प्रकार से होती है।
1. प्रक्रिया की अवमानना-जब जानबूझकर कोर्ट के निर्णय, डिक्री, आदेश रिट अथवा अदालती प्रक्रिया की अवज्ञा की जाए। 2. फौजदारी अवमानना : इसका आशय ऐसे कथन से है जोकि न्यायिक प्रशासन में हस्तक्षेप करे।
कौन होगा दोषी : कोर्ट की कार्रवाई को तोड़ मरोड़ कर भ्रामक रूप से पेश करना कोर्ट की अवमानना कहलाती है।
कंटेप्ट ऑफ कोर्ट के कोई दो अपवाद यानि डिफेंस बताएं ?
---अगर किसी फैसले की जानकारी के अभाव में उसकी अपेक्षा या उल्लंघन हुआ है या ऐसा उल्लंघन जानबूझकर नहीं हुआ।
---किसी न्यायिक कार्य की निष्पक्ष और जनहित में की गई टिप्पणी

-विजय जैन

Tuesday, June 24, 2008

sayonjkji

कवियों में मलखान हुए संयोजकजी
रसिकों के रसखान हुए संयोजकजी
इतनी तंबाकू-कत्थे से की यारी
खुद चूने का पान हुए संयोजकजी
चुनचुनकर सब फ्लाप कवि, एक टीम रची
खुद उसके कप्तान हुए संयोजकजी
मंचखोर तुक्कड़ कवियों के टापू में
मनचाहे वरदान हुए संयोजकजी
भरते सुबहो-शाम जिन्हें मिलकर चमचे
ऐसे कच्चे कान हुए संयोजकजी
मरियल कवि को मिला लिफाफा मोटा-सा
मंद-मंद मुस्कान हुए संयोजकजी
पाल-पोसकर बड़े किये चेले-चांटे
गुरगों के भगवान हुए संयोजकजी
पशुमेला क्या लालकिला तक चर डाला
भैया बड़े महान हुए संयोजकजी
फसल बचाएं मठाधीश की चिड़ियों से
देखो स्वयं मचान हुए संयोजकजी
नीरव से मुठभेड़ हुई जब करगिल में
पिटकर पाकिस्तान हुए संयोजकजी।

Friday, June 13, 2008

yaad

जवानी का हंसी सपना तुझे जब याद आएगा
सिसककर टूटी खटिया पर पड़ा तू भुनभुनाएगा
पुराना ठरकी है बूढ़ा न हरगिज बाज आएगा
दिखी लड़की तो नकली दांत से सीटी बजाएगा
निकल जाए हमारा दम बला से चार बूंदों में
मग़र हमको हकीम अपनी दवा पूरी पिलाएगा
पहन पाया न बरसों से बिचारा इक नई निक्कर
बनेगा जब भी दूल्हा वो नई अचकन सिलाएगा
है अपना दूधिया जालिम मसीहा है मिलावट का
भले ही कोसते रहिए हमें पानी पिलाएगा
जड़ें काटेगा पीछे से जो हँस के सामने आया
खुदा ने दी न चमचे को वो दुम फिर भी हिलाएगा
मिली हैं हूर जन्नत में मगर मिलती नहीं लैला
खुदेगी कब्र जब तेरी तो चांद अपनी खुजाएगा
सनमखाने में दीवाने सजा ले अपने वीराने
खिला दे टॉफी बुलबुल को मज़ा जन्नत का आएगा
पुराना-सा फटा, मैला लिए हाथों में इक थैला
बढ़ा के अपनी दाढ़ी मंचों पर गजल तू गुनगुनाएगा
मिले मेले में दुनिया के थके, हारे, बुझे चेहरे
करामाती है बस नीरव जो रोतों को हँसाएगा।

mahaanta

त्वचा है भैंस की, चेहरे पर विनम्र बैल की मुस्कान है।
बख्शीश लेते देखा मोहल्ले में तो लगा वाकई महान है।।

विचार तस्करी के हैं, एनजीओ की आढ़त से थोक लाता है।
डाल के चुग्गा दिहाड़ी पर रेजा से फटकता, बिनवाता है।।

इंटलेक्चुअल है, रिभोलूसनरी है, ग्यान की बरखा है।
प्रभात से रात तक चलता चमचों का चरखा है।।

आदमी अच्छा है, बस एक पोशीदा बीमारी है।
जो इसके ईगो को आंख मार दे बलात्कारी है।।

नैतिक इतना है कि आइसक्रीम लपेटी है पराठे में।
इसका हर राजदार सिसकता मिला है घाटे में।।

बाप मास्टर है प्राइमरी का प्रोफेसर बताता है।
खाई मकुनी दरभंगा में दिल्ली में बर्गर बताता है।

कर्ज देते कहता- दोस्त है, दास है, दासानुदास है।
न आना फंदे में किसान यह कर्नाटक की कपास है।।

Saturday, June 7, 2008

top ten

हिंदी के टाप टेन अखबार और उनकी प्रसार संख्या

1 दैनिक जागरण (566 lakh)

2 दैनिक भास्कर (319 lakh)

3 अमर उजाला (296 lakh)

4 हिंदुस्तान (252 lakh)

5 राजस्थान पत्रिका (137 lakh)

6 पंजाब केसरी (111 lakh)

7 आज (74 lakh)

8 नवभारत टाइम्स (52 lakh)

9 नवभारत (52 lakh)

10 प्रभात खबर (50 lakh)


अंग्रेजी के आठ बड़े अखबार और उनकी प्रसार संख्या

1 Times of India 136 lakh
2 Hindustan Times 63 lakh
3 Hindu 56 lakh
4 Economic Times 20 lakh
5 Indian Express 20 lakh
6 Mid-Day 18 lakh
7 Mumbai Mirror 16 lakh
8 DNA 13 lakh

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(उपरोक्त दोनों आंकड़े आईआरएस 2008, राउंड वन के हैं। आपने एक चीज गौर की, अंग्रेजी के सबसे बड़े अखबार की प्रसार संख्या हिंदी के पांचवें नंबर के अखबार से भी कम है। लानत है अपने हिंदी वालों पर जो इतनी बड़ी संख्या में होते हुए भी इन मुट्ठी भर अंग्रेजी वालों से आतंकित रहते हैं)

kya karte

चोट खाकर भी मुस्कुराते नहीं तो क्या करते।
दिल के जज्बात दिल में दबाते नहीं तो क्या करते।।

भरी महफिल में जब उन्होंने न पहचाना हमको।
नजर हम अपनी झुकाते नहीं तो क्या करते।।

उनके दुपट्टे में लगी आग न हमसे देखी जाती।
हाथ हम अपना जलाते नहीं तो क्या करते।।

दोस्तों ने जब सरे राह छोड दिया मुझको।
तब हम गैरों को बुलाते नहीं तो क्या करते।।

किस मुददत से वो देख रहा था राह मेरी।
वादा हम अपना निभाते नहीं तो क्या करते।।

चोट खाकर भी मुस्कुराते नहीं तो क्या करते।।
दिल के जज्बात दिल में दबाते नहीं तो क्या करते।

nahana mat

नित नहाने का शुरू जो सिलसिला जाएगा
देख लेना एक दिन तू पिलपिला हो जाएगा
धूल-धक्कड़ से सना जूतेनुमा चेहरा तेरा
भूल से भी धो लिया तो गिलगिला हो जाएगा
लेना मत पंगा कभी तू यार थानेदार से
एक मंजिल का बदन चौमंजिला हो जाएगा
इश्क का चक्कर तेरी बीवी को ना मालुम हो
वरना पंडित सिर तेरा खंडित किला हो जाएगा
घौंटकर रिश्वत के घोटालों में तू चारा मिला
बढ़के सर्किल तौंद का पूरा जिला हो जाएगा
पूछता है कॉलेजों में कौन अब टेलेंट को
फेंक डोनेशन फटाफट दाखिला हो जाएगा
भाषणों को मंत्रियों के तू समझ बस चुटकुले
चुटकियों में दूर तेरा हर गिला हो जाएगा
कर न लेना प्यारे नीरव नर्स से यारी कभी
वरना दुश्मन डॉक्टरों का काफिला हो जाएगा।

us raat haadse mein

मैं मर चुकी हूँ
हर शख्स इसे तोड़ने को तैयार है,
मैं मर चुकी हूँ अब तो जीने दो,
की मेरे सिर पे छत नही दीवार है,

मिटटी की चादर ओढ़ कर
सदियों मैं ये सोचा करूँ
सर्दी नही लगती है अब
यहाँ मौसम मेरे अनुसार है,
मैं मर चुकी हूँ
मेरे सिर पे छत नही दीवार है.

मेरी कब्र पे मेरे पेट के पास
धीरे धीरे से आकर जो
चावल का दाना रख गई,
उस चींटी को लगता है
वो मेरी तिमारदार है
मैं मर चुकी हूँ
मेरे सर पे छत नही दीवार है.

ना साँस लेने की परेशानी
न सोच की हैं उलझाने
सवालों और जवाबों से दूर
न राज है कोई
न कोई राजदार है
मैं मर चुकी हूँ
मेरे सर पे छत नही दीवार है.

बस तन्हाई है ज़रा सी,
पर मुझे पता है
आख़िर यहीं सब आयेंगे,
और कहाँ जायेंगे,
जो अब भी साँसों की
क़ैद में गरिफ्तार हैं,
मैं मर चुकी हूँ
मेरे सर पे छत नही दीवार है.

जब तक उसके पास थी,
वो रोज फूल देता था,
अब सिर्फ़ यह चोंकिदार है
फोल चढाता है और
देखता रहता है,
खैर वो भी प्यार था
और ये भी प्यार है.
मैं मर चुकी हूँ
मेरे सिर पे छत नही दीवार hai

तेरे नाखूनों के निशाँ
जो मेरी कलाई पे थे
अब पिघल गए हैं
और सारे जख्म
अब गल गए हैं
ओअर ये आँखे अब भी
दागदार हैं,
मैं मर चुकी हूँ
मेरे सर पे छत नही दीवार है.

उस रात हादसे में बस
दो ही लोग थे,
फिर मेरा घर,मेरा समाज
पुलिस के सवाल,और
देश की सरकार,
अब क्या बातों कौन कौन
जिम्मेदार है!
मैं मर चुकी हूँ
मेरे सर पे छत नही दीवार है.

मर के इस लड़की ने
कैसे ये कहानी लिख दी,
गर आवाज नही है
तो किसकी जुबानी लिख दी?
सोचते रहो तुम
ये किस्सा
मजेदार है.
मैं मर चुकी हूँ
मेरे सर पे छत नही
दीवार है.

kadki

गाल कटोरा ताल हुए हैं कड़की में
पर्वत भी पाताल हुए हैं कड़की में
हम ठनठन गोपाल हुए हैं कड़की में
फटे हुए रूमाल हुए हैं कड़की में
आंखों में अपनी गर्दिश के आंसू
यार सूअर का बाल हुए हैं कड़की में
घोषित हुए प्रधान हमीं भिखमंगों के
कैसे हम खुशहाल हुए हैं कड़की में
हैं मखमली गलीचे लीडर के नीचे
लोग फटे तिरपाल हुए हैं कड़की में
खिचड़ी को मोहताज हुई खिचड़ी सरकार
कैसे विकट कमाल हुए हैं कड़की में
क्या खाकर उत्तर दें शव के प्रश्नों का
खुद विक्रम बैताल हुए हैं कड़की में
जमीं मुफ्त में फोकटखोरों की चौपाल
नीरव स्वयं सवाल हुए हैं कड़की में

hum dekhenge

चलो अंधे कुंए में आज उतरकर हम भी देखेंगे
अंधेरे आबनूसी हैं संवरकर हम भी देखेंगे
सुना है जादू बिकता है तेरी आंखों के प्लाजा में
तेरे जलवों की गलियों से गुजरकर हम भी देखेंगे
हुस्न की ब्रेड का मक्खन बड़े अंदाजवाला है
मिला जो चांस तबीयत से कुतरकर हम भी देखेंगे
सुना है शोख तितली ने थकाया सारे भंवरों को
कभी अमराई में उसको पकड़कर हम भी देखेंगे
जड़ें होती नहीं फिर भी हरे रहते हैं मनीप्लांट
जड़ों से इसलिए यारो उखड़कर हम भी देखेंगे।

khyaal

ऐसा खयाल आया है मेरे खयाल में
इक छेद कर रहा है वो घर की दिवाल में
अफसर मलेरिया का मरा इस मलाल में
मच्छर ने घर बनाया था क्यों उसके गाल में
है फर्क मुख्य मंत्री तथा राज्यपाल में
जैसे गधे की पूंछ और घोड़े के बाल में
थाने के नाम से थे हम बहुत डरे हुए
झट पहुंचे ले के अपनी रपट अस्पताल में
नर्सों ने हमको बेड पर ऐसे लिया दबोच
जीजा फंसे हों साली की जुल्फों के जाल में
घर डॉक्टर घुसेड़ के सूआ चला गया
और गुदगुदी-सी मच गई गैंडे की खाल में
नीरव के घर मिलेगा कहां शोर-शराबा
शबनम की बूंद ढूंढो न लकड़ी की टाल में।

sochta hoon jab kabhi

सोचता हूं तो डर लगता है।
और नहीं सोचता हूं तो डरता हूं।।
कभी खुद के बारे में।
कभी दूसरों के बारे में।
उस सिग्नल पर बेसुध पडा वह आदमी ही था।
स्टेशन पर चिथडों में घूमने वाला भी आदमी ही था।
भूख से बिलखता हुआ वह बच्चा भी आदमी ही था।
उसी सिग्नल पर लंबी गाडी में एसी की हवा खा रहा वह आदमी ही था।
उसी स्टेशन पर लंबे कोट में सिगरेट के धुंए उडा रहा आदमी ही था।
उस होटल में कई लोगों का खाना बर्बाद करने वाला आदमी ही था।
सोचता हूं तो डर लगता है।
और नहीं सोचता हूं तो डरता हूं।।
कभी खुद के बारे में।
कभी दूसरों के बारे में।

daku aur kavi

चंबल के भयंकर डाकुओं ने
यानी स्टेनलेस स्टील के चाकुओं ने
कर दिया मुख्यमंत्री के आगे आत्मसमर्पण
यानी अपनी ही नस्ल के जंतु के आगे अपना तर्पण
प्रश्न ये उठा कि इन्हें क्या सजा दी जाए
किसी ने कहा-
इनसे चक्की चलवाई जाएं
किसी ने कहा-
इनसे भारी-भारी दरियां बुनवाई जाएं
तो हमने कहा-
भैया...
ये आत्समर्पित डाकू हैं
इसलिए न तो इनसे चक्कीयां चलवाई जाएगी
और न ही इनसे भारी-भारी दरियां बुनवाई जाएंगी
इन सब को सजाए बतौर
माइकपकड़ू कवियों की बोर कविताएं सुनवाई जांएगी
डाकू चिल्लाएंगे...
हमें मार डालो या फांसी के फंदे पर लटकाओ
मगर इन बोर कवियों की कविताओं से बचाओ।

sunia

नर हो या नारी
मुंबई हो या निठारी
जुर्म के सिर पर कभी कोई ताज नहीं होता है
जुर्म-जुर्म होता है जो लिंग का मोहताज नहीं होता है
इसलिए..
इनायत का लफ्ज जिसकी रूह से दूर होता है
वो जुर्म की जहनीयत से मगरूर होता है
वो न आदमी होता है ना औरत सिर्फ क्रूर होता है
सिर्फ क्रूर होता है..।

mann

सपनों में ही jeene वाला मन.......
मिलने कि आस मे तरसता हुआ मन
सपने संजोता आंखो से बरसता हुआ मन
कभी धुप कभी छांव को सहता हुआ मन
पांव के छालो सा रिसता हुआ मन
तनहाईयों मे खुशियो के मेले लगता मन
मिलन कि आरजु मे उसके घर के फेरे लगता मन
चेहरे पर ना जाने क्युं, चेहरे लगाता मन
इक उसी को पाने खातीर गमों को गले लगता मन
रुह को उसके आने की आहट सुनाने वाला मन
खुली बंद आंखो से निहारते रहने वाला मन
पलों के इंतिजार को सदियां कहनें वाल मन
हर पल इक नयी गज़ल गुनगुनानें वाला मन
अश्कों से गमों का दामन भिगोनें वाल मन
तेरे अनकहे सवालों क जवाब खोजनें वाला मन
तेरे ज़ानों मे ता उम्र की खुशी चाहनें वाला मन